NEET UG Counselling 2025 – लाखों छात्रों के लिए NEET एक ऐसा एग्जाम है, जो उनके मेडिकल करियर की दिशा तय करता है। लेकिन हर साल जब रिजल्ट आता है तो एक सवाल बार-बार उठता है—जब दो छात्रों के मार्क्स या परसेंटाइल एक जैसे होते हैं, तो फिर रैंक अलग-अलग कैसे हो जाती है? इस साल यानी 2025 में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। कई टॉपर्स का परसेंटाइल लगभग एक जैसा था, लेकिन उनकी ऑल इंडिया रैंक (AIR) अलग-अलग आई। अब अगर आप भी यही सोच रहे हैं कि ये कैसे हुआ, तो चलिए इस पूरे सिस्टम को आसान भाषा में समझते हैं।
NEET UG 2025: जब परसेंटाइल एक जैसा, तो रैंक अलग क्यों?
NEET UG 2025 के टॉपर बने राजस्थान के महेश कुमार, जिनका परसेंटाइल था 99.999547 और उन्हें मिला AIR-1। वहीं मध्यप्रदेश के उत्कर्ष अवधिया का परसेंटाइल था 99.999095 और उन्हें मिला AIR-2। इतना ही नहीं, महाराष्ट्र के कृषांग जोशी और दिल्ली के मृणाल किशोर झा दोनों का परसेंटाइल था 99.9998189, लेकिन कृषांग को AIR-3 और मृणाल को AIR-4 मिला। अब यहीं से सवाल शुरू होता है—जब नंबर या परसेंटाइल एक जैसा है, तो रैंक में फर्क कैसे?
NTA का टाई-ब्रेकिंग सिस्टम—रैंक तय करने के 7 तरीके
दरअसल, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने इस तरह की टाई सिचुएशन से निपटने के लिए एक खास टाई-ब्रेकिंग सिस्टम बनाया है, जिसमें कुल 7 स्टेप्स होते हैं। इनका इस्तेमाल तब किया जाता है जब दो या ज्यादा छात्रों के अंक एक जैसे होते हैं।
सबसे पहले देखा जाता है कि बायोलॉजी यानी बॉटनी और जूलॉजी मिलाकर किसके ज्यादा नंबर हैं। अगर यहां भी नंबर बराबर हैं तो फिर केमिस्ट्री में देखा जाता है कि किसके मार्क्स ज्यादा हैं। इसके बाद फिजिक्स के नंबरों की तुलना की जाती है।
अगर तीनों सब्जेक्ट्स में भी टाई बना रहता है, तो फिर देखा जाता है कि किसने कम गलत उत्तर दिए हैं—सभी विषयों में मिलाकर। यानी जिसकी गलतियों की गिनती कम होगी, वो आगे होगा। इसके बाद बायोलॉजी, फिर केमिस्ट्री और अंत में फिजिक्स में कम गलत उत्तरों का अनुपात देखा जाता है।
NEET 2025 में जोड़ा गया नया नियम: Random Process
अब अगर ऊपर बताए गए सारे स्टेप्स में भी रैंक तय नहीं हो पाता, तो आखिर में आता है नया नियम—Random Process। यानी कंप्यूटर द्वारा एक रैंडम सेलेक्शन किया जाता है, जो एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति की निगरानी में होता है। यह तरीका इसलिए लाया गया क्योंकि 2024 में बहुत सारे छात्रों को एक ही रैंक मिल गई थी, जिससे काउंसलिंग में भारी दिक्कत आई थी।
पहले कैसे तय होती थी रैंक?
अगर हम पुराने सालों की बात करें, तो पहले रैंक तय करने के लिए उम्र को आधार बनाया जाता था। यानी जो छात्र उम्र में बड़ा होता था, उसे वरीयता मिलती थी। इसके अलावा कभी-कभी एप्लिकेशन नंबर भी देखे जाते थे। लेकिन अब यह तरीका पूरी तरह से हटा दिया गया है। अब सिर्फ और सिर्फ एग्जाम में प्रदर्शन के आधार पर रैंक मिलती है, जिससे पूरी प्रक्रिया ज्यादा ट्रांसपेरेंट और फेयर हो गई है।
निष्कर्ष: हर नंबर का होता है महत्व
NEET UG जैसे कॉम्पिटिटिव एग्जाम में एक-एक नंबर बहुत मायने रखते हैं। जब हजारों छात्र एक जैसे मार्क्स लाते हैं, तो यह जरूरी हो जाता है कि रैंक तय करने का तरीका पूरी तरह से पारदर्शी हो। NTA ने 2025 से जो 7 स्टेप्स और रैंडम सेलेक्शन का प्रोसेस अपनाया है, वह यह सुनिश्चित करता है कि हर छात्र को उसका सही स्थान मिले। इसलिए अगर आपका स्कोर किसी और से मिलता-जुलता है, तो चिंता की जरूरत नहीं—आपकी रैंक पूरी तरह से तय नियमों के आधार पर ही दी जाती है।
FAQs
Q1. अगर मेरा और किसी दूसरे छात्र का परसेंटाइल एक जैसा है तो क्या हमारी रैंक भी एक जैसी होगी?
नहीं, परसेंटाइल एक जैसा होने के बावजूद रैंक अलग हो सकती है क्योंकि NTA टाई-ब्रेकिंग नियमों के जरिए रैंक तय करता है।
Q2. क्या 2025 से उम्र या एप्लिकेशन नंबर को रैंक में वरीयता देने का नियम हट गया है?
जी हां, 2025 से उम्र और एप्लिकेशन नंबर को टाई-ब्रेकिंग के लिए नहीं देखा जाता। अब सिर्फ परीक्षा में प्रदर्शन ही मान्य है।
Q3. रैंडम प्रोसेस में रैंक तय कैसे होती है?
अगर सारे टाई-ब्रेकिंग स्टेप्स के बाद भी टाई बनी रहती है, तो एक स्वतंत्र समिति की निगरानी में कंप्यूटर द्वारा रैंडम प्रोसेस से रैंक तय की जाती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है और इसका मकसद छात्रों को NEET UG 2025 की रैंकिंग प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझाना है। कृपया किसी भी आधिकारिक अपडेट या बदलाव के लिए NTA की वेबसाइट या संबंधित अधिकारियों की सूचना को ही प्राथमिकता दें।